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Sunday, February 12, 2017

February 12, 2017

क़सम तोड़ दें.........| डा० विष्णु सक्सेना

क़सम तोड़ दें.........

Photo Credit : Google
चाँदनी रात में-
रँग ले हाथ में-
ज़िन्दगी को नया मोड़ दें,
तुम हमारी क़सम तोड़ दो हम तुम्हारी क़सम तोड़ दें ।

प्यार की होड़ में दौड़ कर देखिये,
झूठे बन्धन सभी तोड़ कर देखिये,
श्याम रंग में जो मीरा ने चूनर रंगी
वो ही चूनर ज़रा ओढ़ कर देखिये,
तुम अगर साथ दो-
हाथ में हाथ दो-
सारी दुनियाँ को हम छोड़ दें...
तुम हमारी क़सम तोड़ दो हम तुम्हारी क़सम तोड़ दें ।

देखिए मस्त कितनी बसंती छटा,
रँग से रँग मिलकर के बनती घटा,
सिर्फ दो अंक का प्रश्न हल को मिला
जोड़ करना था तुमने दिया है घटा,
एक हैं अंक हम-
एक हो अंक तुम-
आओ दोनों को अब जोड़ दें.....
तुम हमारी क़सम तोड़ दो हम तुम्हारी क़सम तोड़ दें ।

स्वप्न आँसू बहाकर न गीला करो,
प्रेम का पाश इतना न ढीला करो,
यूँ ही बढ़ती रहें अपनी नादानियाँ
हमको छूकर के इतना नशीला करो,
हम को जितना दिखा-
सिर्फ तुमको लिखा-
अब ये पन्ना यहीं मोड़ दें.....

तुम हमारी क़सम तोड़ दो हम तुम्हारी क़सम तोड़ दें ।

Wednesday, February 8, 2017

February 08, 2017

खूबसूरत ग़ज़ल | डा० विष्णु सक्सेना

खूबसूरत ग़ज़ल



जब जब लगा हमें कि खुशी अब सँवर गयी 
हमसे छुड़ा के हाथ न जाने किधर गयी।

तुम मिल गए हो तब से हमे लग रहा है यूँ
बिखरी थी जितनी ज़िन्दगी उतनी निखर गयी।

गुल की हरेक पंखुरी को नोच कर कहा
तुम से बिछड़ के ज़िन्दगी इतनी बिखर गयी।

मैं देख कर उदास तुझे सोचता हूँ ये
तेरी हँसी को किसकी भला लग नज़र गयी।

घबराइये न आप हो मुश्किल घड़ी अगर
गुजरेगी ये भी जब घड़ी आसाँ गुज़र गयी।

मुझको पता नही था ये उसका मिजाज़ है
वो भोर बन सकी न तो बन दोपहर गयी।

मैं साथ उसके चल नही सकता ये जानकर
वो इक नदी थी झील के जैसी ठहर गयी||